पीली धूप chapter 4
- स्मृति के अंश
जब एस. पी . साहब ने मंगल को बॉडी की पहचान करने के लिए चलने को कहा तो मंगल भी थोड़ी देर के लिए स्तब्ध रह गया|
पर अपने आप को सँभालते हुए नीलिमा को जीप की तरफ इशारा करते हुए कहता है -हमें एस. पी .साहब के साथ चलना होगा कोई आदमी की बॉडी मिली है नाले के दूसरे मुहाने पर ,यहाँ से कुछ दूर पर है |चलो ....और कहते- कहते चुप हो गए.. | उनकी आंखे डबडबा गई|
नीलिमा पत्थर सी आगे बढ़ कर जीप में बैठ गई |जीप चलने लगी ...,और नीलिमा भी कुछ पल के लिए बीते हुए वक्त में गुजरने लगी..,जब पहली बार हरीश के साथ जीवन के नए परिवेश में आयी थी | सब कुछ उसके आंखो के सामने से मन के आइने में साफ़ - साफ़ दिखने लगा जैसे यादों की आँधी चलने लगी |
नीलिमा बिहार के पूर्णिया जिले के एक छोटे से गाँव सेंगर की रहने वाली ,पढ़ी लिखी ,गोरा रंग, छड़हरी काया और खींची हुई आँखे निश्छल और शांत लड़की थी |
जब पहली बार हरीश उसे देखने आया था, तो एक ही ख्वाहिश थी की वो उसे मान -सम्मान के साथ अपने परिवार का अभिन्न हिस्सा माने | हरीश और उसकी माँ के अलावे परिवार में और कोई नहीं था |क्यूंकि हरीश के पिता जी एक ट्रेन दुर्घटना के शिकार हो गए थे ,इसलिय माँ के आँखों का तारा, एक मात्र सहारा था |माँ कभी नहीं चाहती थी कि हरी कमाने के लिए गाँव से दूर जाए | लेकिन गाँव की गरीबी और हर साल बाढ़ से तबाह होते गाँव की हालत के आगे विवश होकर गाँव के हरिहर काका के साथ कलकत्ता के लिए ट्रेन पकड़ लिया | उस समय हरीश केवल सोलह साल का था| कुछ दिनों तक कलकत्ता के कपड़ा मील में काम किया | वहीँ उसकी पहचान मंगल भाई से हुए थी उसकी क़ाबलियत देखते हए मंगल ने अपने बस्ती में एक घर किराये पर दिलवा दिया तब से वे उनके परिवार के सदस्य जैसा हो गया था | जब पहली बार नीलिमा शाहपुर आई थी तो मंगल की अम्मा उसे बड़े प्यार से घर बसाने में मदद की थी |और आज भी उनलोगों का हीं तो साथ मिल रहा था , जिससे नीलिमा इस दुःख के घड़ी में हिम्मत बांधे चल रही थी |
जीप के हॉर्न से नीलिमा स्मृतियों के भंवर से बाहर आ जाती है | जीप रुका तो सब उस ओर जाते हैं जहाँ किसी की मृत शरीर एक स्ट्रेचर पर लेटाया रहता है |
नीलिमा को अब भी लग रहा था ,कि ये हरीश नहीं हो सकता |
इतना निष्ठुर कैसे हो सकता है भगवान अभी सुहाग का चोला ओढ़े उसे बस तीन साल हीं तो बीते है कितने अरमान और कितने सपने हैं उन दोनों के भविष्य को लेकर ,वो नहीं हो सकता ...यहीं सोंच रही थी ..पर जब स्ट्रेचर के पास गए तो उसके हाथ पाँव कांपने लगे ...कांपते हुए उसने चेहरे पर से चादर हटाया ....
और एक दम से बैठ गयी...,रोते हुए कहने लगी नहीं भैया ये वो नहीं हैं ,...साहेब ये मेरा हरीश नहीं है |थोड़ी देर वैसे हीं बैठी रही |
मंगल ने भी देखा तो कहा -नहीं सर !.. ये तो हरीश नहीं है | और एक गहरी सांस ली !
पर साहब ये तो हमारे हीं बस्ती का मंगरू है जो पिछले दो दिनों से लापता है | इसे कौन मार सकता है ? ये तो बस्ती के बगल वाले चाय बगान में डेली वेजेस पर काम करता है |भला इससे किसी को क्यों दुश्मनी होगी ?समझ में नहीं आ रहा कौन और क्यों ये सब कर रहा है ? इन सबके पीछे उनकी मंशा क्या है ?
एस पी सिन्हा को समझते देर नहीं लगी की ये हत्या का मामला हो सकता है ,सो बॉडी को पोस्ट मार्टम के लिए भेजने का आर्डर दे दिया |
अब नीलिमा और मंगल घर के लिए निकल पड़े |यहाँ से बस्ती ज्यादा दूर नहीं था सो पैदल हीं जाने लगे |
नीलिमा को अब थोड़ा -थोडा विश्वास होने लगा लगा था की हरीश जरुर कहीं न कहीं दिख जायेगा, सो अपनी चेतना से चारों ओर उसका मन उसी को ढूंढ रहा था | घर के करीब वे पहुँचने वाले थे की मंगल का भाई बिराज दौड़ा -दौड़ा उनकी ओर हांफता हुआ आ रहा था |
दोपहर हो गया है इसे तो कारखाने काम पर जाना था ,फ़िर ये क्यों दौड़ा दौड़ा आ रहा है ?
मंगल सोंच हीं रहा था की बिराज बोल पड़ा - भैया ! हरीश मिल गया है |..
क्या कह रहे हो ?कहाँ ?
नीलिमा को एक पल के लिए जैसे पुरे शरीर में रक्त की संचार लौट आई थी ....चेहरे पर बिजली - सी चमक दौड़ने लगी |
उत्साह और ख़ुशी के साथ चिंता की हल्की रेखा के साथ बोली - भैया ! क्या !..कहाँ हैं वो ? वो ठीक तो हैं ना ?
हाँ भाभी !..वो ठीक है , पर ...और कुछ कहते- कहते रुक गया |
क्या ,! क्या हुआ ? साफ़ - साफ़ बोलो , मंगल चिंता से बोला
दोनों तेजी से घर की तरफ़ बढ़ने लगे |
भैया!.. वो बस्ती के पीछे वाले तालाब के किनारे बेहोश मिला था,..
बस्ती के लड़के मछली मारने गए तो उन लोगों ने हमें खबर की,..हम बस्ती के लोगों के साथ जाकर वहाँ देखें तो पता चला किसी ने बड़ी बेरहमी से मारा है ,| हरीश की सांसे चल रही थी , सो हम लोग उसे हॉस्पिटल ले गए | डॉक्टर ने भर्ती कर लिया है पर अभी होश नहीं आया है | डॉक्टर ने कहा है हमने दवा दे दिया है ,पर सिर में चोट लगी है इसलिए बेहोश है |अगर चौबीस घंटे में होश नहीं आया तो दूसरे हॉस्पिटल में ले जाना पड़ेगा ...
नीलिमा ये सुन कर फ़िर से निराश हो गयी |
ये कैसी परीक्षा ले रहा था वक्त ,....जो एक पल आशा से भर देता तो अगले हीं पल निराशा की काली छाया मंडराने लगती |
इस धूप - छाँव में उसका मन घुटने लगा था |एक बात का तो संतोष हुआ, कि हरीश मिल गया.., जिस भटकाव में पिछले रात से वो उसे ढूंढे जा रही थी , वो उसे पाकर उसका थोड़ा हिम्मत बंधा |
मंगल ने कहा -बहुरिया ! पहले घर जाकर थोड़ा कुछ खा लो , सुबह से कुछ नहीं खाई हो ..,मुनिया भी तुम्हें देखे बिना रो रही होगी | कुछ कपडे बांध लेना फ़िर अस्पताल चलकर देखते हैं |तुम चिंता मत करना पैसों का इंतजाम हो जायेगा |
और हाँ ,..,हम सब तुम्हारे साथ हैं |
नीलिमा को उनकी बातों से बहुत राहत मिला .|
जैसे हीं घर पहुंची ,- देखा अम्मा मुनिया को लेकर उसके घर में पहले से बैठी थी साथ में बस्ती की कुछ औरतें भी आ गयी थी | हरीश के साथ जो हुआ ये बात जंगल में आग की तरह फ़ैल गई पूरी बस्ती में हडकंप मच गया की किसने आखिर हरीश को मारा होगा ? एक और घटना जो अभी दबी जुबान में सब के मुँह पर चल रही थी की गाँव वालों का ही हाथ होगा इसके पीछे और फ़िर बस्ती का एक और व्यक्ति (मंगरु) की लाश जो नाले के पास मिला ? वो भी तो नहीं मालूम ,,न जाने किसने मारा हो उसे ?और भी सैंकड़ों आशंकाएं और डर सबके मन में घर करने लगी थी |
मुनिया की माँ तुम पहले कुछ खा लो ,...कह कर अम्मा ने दो रोटी और दाल एक थाली में पड़ोस कर दिया...! सुबह से कुछ खाई नहीं है ., कैसा हाल हो गया है | भगवान का शुक्र है हरीश मिल गया है,.. अब ठीक भी हो जायेगा..|
भूख नहीं है अम्मा -नीलिमा ने मना करते हुए कहा .., पर सब लोगों के ज़िद के आगे ज्यादा कुछ बोल ना सकी तो मुनिया को गोद में लेकर रोटी के एक टुकड़ा जल्दी से खा कर पानी पी कर कुछ कपडे बांध कर अस्पताल जाने को तैयार हो गई |
अम्मा..,! मुनिया को आपके पास छोड़ कर जा रही हूँ बस इसका ख्याल रखना ...
बाकि भगवान की क्या मर्जी है ..कहते कहते गला भर आया नीलिमा का |चुप हो जा बहुरिया सब ठीक हो जायेगा ,तू हिम्मत रख |
बिराज और मंगल भी आ गए थे अस्पताल जाने के लिए ..नीलिमा को साथ लेकर ऑटो में बैठ कर चल दिए |
अस्पताल में हरीश को तत्काल चिकित्सा विभाग में रखा गया था | सरकारी अस्पताल में एक ही बड़े डॉक्टर थे जो सभी रोगियों का निरीक्षण कर रहे थे |बीमारों की संख्या इतनी ज्यादा थी की अकेले डॉक्टर से सब कुछ संभल पाना बहुत मुश्किल था |हेल्प के लिए तीन -चार सेविकाएँ थीं ,पर हरीश की नाज़ुक हालत के लिए किसी स्पेशलिस्ट की ज़रूरत थी | अस्पताल वालों ने पुलिस को भी जानकारी दे दी थी क्योंकि यह एक आपराधिक मामला था इसलिए एस .पी साहब भी वहाँ पहूँच चुके थे , मरीज़ से बयान लेने के लिए ,पर अभी हरीश को होश नहीं आया था | एक कांस्टेबल वहीं छोड दिए और वे पुलिस स्टेशन चले गए |
जब नीलिमा अस्पताल पहुँचती है तो डॉक्टर ने कहा - हमने सारे हेल्थ -चेकअप करवा लिए हैं शाम तक सारे रिपोर्ट आ जायेंगे ,उसके बाद हीं कुछ कहा जा सकता है | वैसे बाहरी रूप से ज्यादा चोट नहीं है पर सिर पर गहरी चोट है , और अगर आज रात को होश नहीं आता है तो आपको कलकत्ता एम्स में ले जाना होगा |क्योंकि सिर में चोट लगने से ब्रेन हेमरेज हो जाने की सम्भावना है ,और अंदरूनी रूप से खून जमा होने के कारण मरीज़ कोमा में जा सकता है | अभी तो कुछ दवाइयां लिख दिए है जिन्हें आपको मंगवाना पड़ेगा क्योंकि ये दवाइयां सरकारी दवाखाने से मिल पाना मुश्किल है |
नीलिमा बड़े ध्यान से डॉक्टर साहब की हर बात सुन रही थी ,और अंत में इतना हीं पूछती है -डॉक्टर साहब ये ठीक तो हो जायेंगे ना..! और आँखों से आँसू छलक पड़े |
बिलकुल !... आप हिम्मत रखो ...रिपोर्ट आने के बाद और अच्छे से पता चल पायेगा ,कि कोई ज्यादा परेशानी तो नहीं ...|वैसे भी भगवान पर भरोसा रखिये ...सब ठीक हो जायेगा |
नीलिमा के पास तो इतने पैसे भी नहीं थे कि दवाइयाँ ला सके ,इसलिए मंगल से बोली _भैया मेरे पास तो बस सौ रुपये है ...कैसे ?और आगे कुछ बोले बिना हीं दवाइयों की पर्ची आगे बढ़ाते हुए उनके तरफ़ बेवश नज़रों से देखने लगी |
मंगल ने कहा -कोई बात नहीं , तुम फिकर मत करो मेरे पास हैं , और पर्ची लेकर दवाइयाँ लेने के लिए बिराज को भेज देता है |
क्रमशः ...,


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