रेत की मछली उपन्यास :- समीक्षा
किताब का नाम,,,,,,,,, रेत की मछली
लेखिका ,,,,,,,,,,, कांता भारती
प्रकाशन वर्ष ,,,,,,,,,,,,,,,,,, 1981
प्रकाशन ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, लोकभारती प्रकाशन
समीक्षा:-उपन्यास ( रेत की मछली )
रेत की मछली, डॉ धर्म वीर भारती की पहली पत्नी कांता भारती के द्वारा लिखा गया एक संवेदनशील उपन्यास,,,,, नारी मन के अंतर्भावों को उकेरता यह उपन्यास उनकी पीड़ाओं और दर्दो का आईना ही है। इस उपन्यास में उन्होंने अपने वैवाहिक जीवन के दुखो का वर्णन किया है,,, जिसे पढ़ने के बाद किसी का भी मन रो उठे।
इसकी भूमिका में भारती ने लिखा है- मेरे लिए इस उपन्यास का लिखना वैसा ही रहा है, जैसे पीड़ा के क्षणों में पूरी आस्था के साथ प्रार्थना करना. इस उपन्यास में भी पीड़ा और प्रार्थना जैसा ही कुछ है. अगर आप पितृसत्तात्मक व्यवस्था में पल-बढ़ रहे हैं तो आसानी से ये उपन्यास दिल के काफी करीब प्रतीत होगा और इसके पात्र तथा घटनाएं अपने प्रेम, त्याग और समर्पण के लिए दिल में उतर जाएंगे. लेकिन जरा सा कॉमन सेंस इस्तेमाल करेंगे तो प्रेम का ये ढांचा भरभरा के गिर जाएगा और पता चलेगा कि ‘गुनाहों का देवता’ प्रेम कथा नहीं बल्कि अपराध कथा है. कुछ वैसी लाइन पर जिस पर ब्लादिमीर नॉबकोव का उपन्यास ‘लोलिता’ चला है. लोलिता और गुनाहों का देवता के नायकों में फर्क बस इतना ही है कि लोलिता का नायक अपनी वासना के लिए खुल के बोलता है और अपराध करने से नहीं चूकता. वहीं ‘गुनाहों का देवता’ का नायक अपनी वासना को तमाम प्रपंचों में रचते हुए बेदाग निकल जाता है और उपन्यास की सारी औरतों के हृदय में देवता का स्थान पाता है.।
इससे पहले धर्म वीर भारती ने अपने कालजयी उपन्यास, गुनाहों का देवता, 1951 में प्रकाशित कराया। इस उपन्यास ने हिंदी साहित्य में एक नया कर्तिमान स्थापित किया,, इस उपन्यास को जो स्थान मिला, वह शायद ही किसी ओर उपन्यास को प्राप्त हुआ हो। सुधा और चंदर की प्रेम कहानी पर आधारित इस उपन्यास में भारती जी ने चंदर के रूप में स्वयम अपने ही चरित्र को निभाया है और शायद प्रायश्चित्त के रूप में अपने उपन्यास का नाम गुनाहों का देवता रखा,,। लेकिन इस देवता के गुनाहों को जानने के लिए आपको रेत की मछली उपन्यास अवश्य पढ़ना चाहिए,, ताकि आप सभी को पता चल सके इस देवता के गुनाह क्या थे,,,, , ,,,,,,,
शायद किसी को मेरी बात बुरी लग सकती है लेकिन मैने वही लिखा जो इस उपन्यास को पढ़ने के बाद मैने महसूस किया हो सकता है कि आप कुछ ओर महसूस करें।
खैर सही गलत के चक्कर में ना पड़ते हुए मै केवल इतना लिखना चाहूँगी,,, निःसंदेह यह उपन्यास,, (रेत की मछली ) स्त्री विमर्श के चुनिंदा उपन्यासों में महत्व पूर्ण स्थान रखता है। हालाँकि यह उपन्यास शिल्प की दृष्टि से गुनाहों के देवता की तुलना में काफी कमजोर हो सकता है लेकिन भावों की दृष्टि से यह कहीं से भी कमजोर नही है। जो बात धर्म वीर भारती ने खुल कर नही बताई वही बात कांता भारती जी ने अपने इस उपन्यास में बताई है। चंदर के असली चेहरे को परत दर परत उधेड़ता है यह उपन्यास।,,,,,,,
शोभन्,,,,,, जिसके लिए कुंतल अपना सब कुछ छोड़ देती है,,, अपने माँ बाप के प्रेम को ठुकरा देती है,,, सबसे विद्रोह करके उससे विवाह करती है,,, सब कुछ भुलाकर याद रखती है तो बस शोभन् के ये शव्द,,,,,,,,,,,,,,,,
विश्वास करो कुंतल, मै आजीवन तुम्हारे साथ खड़ा रहूँगा,,,,,,,
लेकिन जब वही शोभन् उसे मीनल के लिए छोड़ देता है, तो उसकी अंतर आत्मा चित्कार कर उठती है,, वह गुनाहों का देवता कितने आत्याचार करता है वह आपको रेत की मछली पढ़कर ही समझ आयेगा,,,,,,,
शोभन् जिसे अपनी बहन कहता है उसी के साथ नाजायज रिश्ता भी रखता है।यह उपन्यास टूटते रिश्तों की सच्चाई से रूबरू करता है। उपन्यास की शुरुआत में ही टूटते रिश्ते का पता चल जाता है। जगह जगह लेखिका ने अपनी वर्बादी के प्रतीक के रूप में जंगली बेल का जिक्र किया है,, जैसे जैसे यह जंगली बेल बड़ती जाती है वैसे वैसे लेखिका की बर्बादी होती जाती है।,,,,,,,,
कुछ भी कहो अगर आपको गुनाहों के देवता का सच जानना है तो आपको रेत की मछली अवश्य पढ़नी चाहिए,, तभी आपको पता चलेगा कि वो गुनाहों का देवता नही राक्षस है और वो भी दो पैरों वाला,,,, जिसके गुनाह माफी के भी लायक नहीं है
अगर दोनों उपन्यासों को मिलाकर ना देखा जाए और दोनों के लेखकों के जीवन को ना भी जोड़ा जाए तो भी ये उपन्यास बेहद पठनीय है. कुन्तल का चरित्र भारतीय सामाजिक प्रतिबंधों में जकड़ा होता है. । वहीं मीनल का किरदार मानसिक समस्याओं से ग्रस्त है., कुल मिलाकर जिन्होंने गुनाहों का देवता पढ़ी है उन्हें ये उपन्यास अवश्य पढ़ना चाहिए।
उम्मीद है आप एक बार रेत की मछली उपन्यास को पढ़ कर इसका आनंद ज़रूर लेंगे।
Dr. Madhuri
🙏

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