बाणभट्ट की आत्मकथा:- समीक्षा और सारांश
समीक्षा: बाणभट्ट की आत्मकथा रचनाकार - आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी प्रकाशन वर्ष:-1946 राजकमल प्रकाशन पात्र - बाणभट्ट (भट्ट)- असली नाम दक्ष निउनिया - निपुनिका का प्राकृत नाम भट्टिन- देवपुत्र तुवर्मिलिंद की कन्या बाणभट्ट की आत्मकथा एक ऐतिहासिक हिंदी उपन्यास है। यह उपन्यास अपनी ऐतिहासिक गरिमा को कायम रखते हुए एक महाकव्यत्मक ऊंचाइयों को छूता है। इस उपन्यास में द्विवेदी जी ने प्राचीन कवि बाणभट्ट के बिखरे जीवन सूत्रों को बड़ी कुशलता एवं कलात्मक से पिरोकर ऐसी कथावस्तु निर्मित की है जो जीवन का साक्षात्कार कराती है। यह आत्मकथा हर्ष कालीन सभ्यता और संस्कृति का जीवंत दस्तावेज है। इस उपन्यास के माध्यम से तत्कालीन धर्म साधना और राजनीति का चित्र प्रस्तुत कर एक उत्कृष्ट जीवन दर्शन भी प्रस्तुत किया है -: "मनुष्य जितना देता है, उतना हीं पाता है, आत्मदान ऐसी वस्तु है जो दाता और ग्रहीता दोनों को सार्थक बनाता है।" "यह बंधन हीं चारुता है, संयम है, सुरुचि है, बंधन हीं सौंदर्य है, आत्मदान ही सुरुचि है, बाधाएं हीं माधुर्य है।"इस उपन्यास के सभी पात्र संयमी और दानी हैं। उपन्...