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पीली धूप chapter 4

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    स्मृति के अंश     जब एस. पी . साहब ने मंगल को बॉडी की पहचान करने के  लिए चलने को कहा तो मंगल भी थोड़ी देर के लिए स्तब्ध रह गया| पर अपने आप को सँभालते हुए नीलिमा को जीप की तरफ इशारा करते हुए कहता है -हमें एस. पी .साहब के साथ चलना होगा कोई आदमी की बॉडी मिली है नाले के दूसरे मुहाने पर ,यहाँ  से कुछ दूर पर है |चलो ....और कहते- कहते चुप हो गए.. | उनकी  आंखे डबडबा गई|   नीलिमा पत्थर सी आगे बढ़ कर जीप  में बैठ गई |जीप चलने लगी ...,और नीलिमा भी कुछ पल के लिए बीते हुए वक्त में गुजरने लगी..,जब पहली बार हरीश के साथ जीवन के नए परिवेश में आयी थी | सब कुछ उसके आंखो के सामने से मन के आइने में साफ़ - साफ़ दिखने लगा जैसे यादों  की आँधी चलने लगी |    नीलिमा बिहार के पूर्णिया जिले के  एक छोटे से गाँव सेंगर की रहने वाली ,पढ़ी लिखी ,गोरा रंग, छड़हरी काया  और खींची हुई आँखे निश्छल और  शांत लड़की थी |  जब पहली बार हरीश उसे देखने आया था, तो एक ही ख्वाहिश थी की वो उसे मान -सम्मान के साथ अपने परिवार का अभिन्न हिस्सा माने | हर...

पीली धूप Chapter 3

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  हरीश की तलाश  नीलिमा और मंगल दोनों घबराये हुए पुलिस चौकी पहुँचे | नीलिमा ने पुलिस कांस्टेबल से पूछा -साहब ! एक रिपोर्ट लिखवानी है | कांस्टेबल  सामने बैठे सब  इंस्पेक्टर बिपिन सिन्हा जी की तरफ़ इशारा  करते हुए  कहा -बड़े साहब वहाँ हैं,   जा कर अपनी रिपोर्ट वहीँ लिखवाओ मुझे अभी पेट्रोलिंग पर जाना है | नीलिमा सब इंस्पेक्टर के पास जाकर बोलती  है -साहब ! मेरा  पति कल दुकान के लिए   घर से सुबह निकला था लेकिन  अभी तक घर वापस नहीं लौटा |हमलोगों ने दुकान पर जाकर भी देखा लेकिन वहाँ कोई नहीं था |दुकान का गेट  भी कुछ टूटा और बिखरा  लग रहा है ,और बगल वाले जगेसर चाचा ने भी जो कहा वो सुनकर हमें बहुत डर लग रहा है |सब कुछ एक सांस में हीं कह रही थी | सब  इंस्पेक्टर बिपिन सिन्हा ने सामने कुर्सी पर बैठने का इशारा करते हुए एक ग्लास पानी मंगवाया और कहा -मैडम ! पहले आप शांत हो जाइये |फ़िर  जो हुआ वो बताइए |हम है ना आपकी समस्या का समाधान निकल आएगा | बिपिन सिन्हा अभी पिछले महीने ही बिहार से ट्रांसफर होकर पश्चिम बंगाल के शाहपुर ज...

पीली धूप | Chapter 2

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  खोज  और याथार्थ से सामना   नीलिमा अपने छोटे से कमरे में दीवार से सटे चारपाई पर मुनिया को लेटा देती है ,और अपने मन को बांधते हुए अपने भींगे कपड़ों  को बदलकर मुनिया के पास आकार लेट जाती है |बारिश की झम- झमाहट  अब कम होने लगी थी ...| शायद इंद्र देवता भी उसके दुःख को समझ रहे थे |उसे अब सुबह होने का बेसब्री से इन्जार था | ताकि हरीश का पता लगा सके ....| वीरगंज जैसे छोटे और पिछड़े  गाँव से निकल कर शाहपुर के बस्ती में उसका छोटा सा  आशियाना अपनी जीवन गति से चल रहा था | जहाँ नीलिमा अपने कुशल गृहस्ती  को बड़े जतन से सजा सवांर रही थी |वो हिम्मती और होशिआर भी थी |अपने पति के छोटी सी किताबों की दुकान के आमदनी से संतोष और ख़ुशी से रह रही थी |और कुछ  पैसे वीरगंज में रह रही हरीश की अम्मा को भी भेज देती |  कुछ पल के लिए नीलिमा अपने जीवन के गुजरे पलों में खो गयी और शायद आँखे लग गयी | सुबह  की पहली किरण के साथ ही नीलिमा की आँखे खुल गयी थी या फ़िर रात भर सोयी ही नहीं थी ..|सावन की झमाझम बारिश के बाद ये सूरज  की पहली धूप  में पूरा घर और मुहल्ला जै...

पीली धूप ( Novel) chapter 1

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नीलिमा का संघर्ष कल से हो रही मुसलाधार बारिश में पूरा घर गली मुहल्ला सब इस कदर डूब गया था की एक इंच भी चलने के लिए जगह नहीं बची थी..... |  एक तो संकड़ी गली और उसपर गली के मुहाने पर कूड़े के लगे अंबार से नालियाँ भी अपना रास्ता भूल चुकी थी और गली में फ़ैल कर घरों की तरफ़ अपना पैर पसारने लगी थी... | रात होने वाली थी और बारिश छुटने का नामो निशान भी नहीं था | दो साल की मुनिया अपने पापा के आने के इंतजार में दरवाज़े पर टकटकी लगाये बैठी बैठी सोने लगी | तेज बारिश से उसका घर पूरी तरह भीग गया था |छत के टीने से टपकते बारिश के पानी से मिट्टी का चूल्हा पूरी तरह भीग गया था | नीलिमा (उसकी माँ) ने  पूरी कोशिश की ताकि  घर के कोने कोने को भीगने से बचा ले  लेकिन  तंगी और गरीबी का मजाक उड़ाते ये गरजते बादल और बिजली की चमचमाती रौशनी उसे चुभ रही थी ......| हरीश(मुनिया के पापा ) अभी तक नहीं लौटा था हर दिन तो शाम के पांच - छः बजते बजते आ जाता था क्योंकि वो रेलवे स्टेशन पर अपनी एक छोटी सी दुकान चलाता था और उस स्टेशन  पर शाम पांच बजे के बाद कोई गाड़ी नहीं आती थी उसके बस्ती  से स्टेशन ब...

मुसाफिर... तुझको चलना होगा

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  मुसाफ़िर, .. तुझको चलना होगा.. 🌈 मुसाफ़िर , तुझको चलना होगा,  पथ में फ़ुल बिछॆ हों ,या फिर काँटों पर भी चलना होगा.  कंकड़ - पत्थर से टकरा कर, फ़िर से तुम्हें सँभलना होगा.,  मुसाफ़िर , तुझको चलना होगा., 🐚🌹🌴 सुख के घने छाँव हों, या फिर, दुख के धुप में रहना होगा.  आसमान के नभ के तारों ,के भी पार पहुँचना होगा..,  मुसाफ़िर , तुझको चलना होगा., 🏵🌹 जीवन में संगीत मधुर हो, या कोई कर्कश वाणी,  सब कुछ तुझको सहना होगा, आगे बढ़ते रहना होगा..,  प्यार मिले या अंगारे, जो तुमने हैं फ़ैलाए , तुम्हीं को ,अब सब रखना होगा.,  मुसाफ़िर , तुझको चलना होगा,.., 🐦🌴🌹🏵 दिन के ढ़लने से पहले, तुझे मंजिल तक पहुँचना होगा.,  घोर निराशा के चादर से, अब तो बस निकलना होगा , जीवन में कुछ ऐसा, करके अब तो तुम्हें दिखाना होगा ., मुसाफ़िर , तुझको चलना होगा... ✈⏳ जर्जर तन के साये हों , या हो नव यौवन की स्फ़ुर्ति .., हर हाल में तुझको चलना होगा, बस आगे बढ़ते रहना होगा.. साथ में कोई हो साथी, या फिर अकेले हो जाना .  जीवन पथ पर , ये मुसाफ़िर ,         ...

माँ

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  माँ इश्वर का वो अंश है जिसकी तुलना संसार में किसी से नहीं किया जा सकता है | माँ कभी जननी है तो कहीं पथदर्शक,  कभी रक्षक है तो कभी संरक्षक |माँ का हर ऱूप अतुलनीय है | इश्वर ने जब सृष्टि की रचना की तो अपने प्रतिरूप में माँ की रचना की जिससे वो हर पल सब पर प्यार और ममता बराबर बरसाता रहे | 🙏                  माँ हीं वो कड़ी है जो अपने बच्चों को उचित संस्कार देकर उसे संसार में इस योग्य बनाती है कि वो एक मिशाल बन कर यश प्राप्त कर सके | माँ के प्रयासों से ही  उसके संतान रीति रिवाजों, सभ्यता और संस्कृतियों का अनुसरण कर एक उन्नत समाज की स्थापना कर सकते हैं | क्योंकि माँ हीं अपने संतानों की प्राथमिक पाठशाला होती है  | अपने प्यार और वात्शल्य से वो अपने संतान को दयालुता का पाठ भी सिखलाती है | परंतु कभी कभी अपने सख्त व्यवहार से उन्हें पतन के मार्ग पर जाने से भी बचाती है |🌹🌴🏵      किसी भी व्यक्ति का चरित्र निर्माण उसके माँ की बुद्धिमत्ता पर भी निर्भर करता है | लाड़ प्यार के नाम पर संतान को अधिक छूट देने वाली माँ को...

Free Hindi Stories, नई कहानियां

  धूप छांव में खिलती जिंदगी   बात उन दिनों की है जब मैं अपनी माँ के साथ पास हीं के अस्पताल में उनके आँखो की जाँच करवाने गई थी । उमस भरी गर्मी से  हमारा गला सुखा जा रहा था । घर से निकलने की में जल्दी जल्दी मे पानी भी घर पर  ही भूल गई थी। और प्यास रुकने का नाम नहीं ले रही थी अस्पताल में लम्बी लाइन लगी हुई थी जिसे देखते ही गर्मी से मन और भी बेचैन हो रहा था। डॉक्टर साहब के आने में अभी देर था। सो मैंने माँ को नम्बर लगा कर वही एक कोने में पड़ी कुर्सी पर बिठा दिया ,और मैं भी अपने लिए जगह तलाशने लगी तभी वहाँ पास ही में एक जगह खाली मिल गया तब मैं भी आराम से वहां बैठ गई। लेकिन मेरी नज़र अनायास ही बगल में बैठी उस युवती पर गई। देखने से वह बीस बाइस वर्ष की  गर्भवती लग रही थी। उसकी  आँखों में कुछ परेशानी था शायद इसलिए यहाँ उसकी आँखें सुजी हुई और लाल दिख रही थी। वह एक दम पतली - दुबली  थी और रोगियी दिख रही थी । उसके साथ कोई भी नहीं था वो अकेले हीं इस  विषम अवस्था में अस्पताल आई थी । मुझसे उसकी ऐसी हालत देखी नहीं जा रही थी सो मैंने उससे पुछा तुम  अकेले इस अवस्...