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धूप छांव में खिलती जिंदगी
बात उन दिनों की है जब मैं अपनी माँ के साथ पास हीं के अस्पताल में उनके आँखो की जाँच करवाने गई थी । उमस भरी गर्मी से हमारा गला सुखा जा रहा था । घर से निकलने की में जल्दी जल्दी मे पानी भी घर पर ही भूल गई थी। और प्यास रुकने का नाम नहीं ले रही थी अस्पताल में लम्बी लाइन लगी हुई थी जिसे देखते ही गर्मी से मन और भी बेचैन हो रहा था। डॉक्टर साहब के आने में अभी देर था। सो मैंने माँ को नम्बर लगा कर वही एक कोने में पड़ी कुर्सी पर बिठा दिया ,और मैं भी अपने लिए जगह तलाशने लगी तभी वहाँ पास ही में एक जगह खाली मिल गया तब मैं भी आराम से वहां बैठ गई। लेकिन मेरी नज़र अनायास ही बगल में बैठी उस युवती पर गई। देखने से वह बीस बाइस वर्ष की गर्भवती लग रही थी। उसकी आँखों में कुछ परेशानी था शायद इसलिए यहाँ उसकी आँखें सुजी हुई और लाल दिख रही थी। वह एक दम पतली - दुबली थी और रोगियी दिख रही थी । उसके साथ कोई भी नहीं था वो अकेले हीं इस विषम अवस्था में अस्पताल आई थी । मुझसे उसकी ऐसी हालत देखी नहीं जा रही थी सो मैंने उससे पुछा तुम अकेले इस अवस्था में क्यों आई हो ? क्या तुम्हारे पति साथ में नहीं आ सकते थे?
वो औरत मेरे इतना पूछते हीं थोड़ा असहज हो गई और उसकी आंखों में पानी भर आया। मैंने थोड़ा ज़ोर दिया तो रोने लगी। मुझे लगा मैंने उसके किसी दुखते हुए दर्द पर हाथ रख दिए हो। मैं थोड़ा घबरा गई इसलिए कहा- क्या हुआ ? सब ठीक है न कोई परेशानी है क्या? उसने बड़ी हिम्मत से अपने आँसू पोछे और अपने आंखों को छुपाते हुए कहा - नहीं, नहीं! कोई बात नहीं है। मैं ठीक हूँ ।
लेकिन उसकी इस ठीक में मुझे न जाने कुछ भी ठीक नहीं लग रहा था। लेकिन बात को आगे बढ़ाते हुए मैंने कहा- लगता है आपकी आंखों में ज्यादा दर्द हो रहा है। कोई बात नहीं डॉक्टर साहब भी आ गए हैं। सब ठीक हो जाएगा। और बात बदलते हुए मैं चूप हो गई।
कुछ देर बाद हमारा नम्बर आ गया और मां को लेकर डॉक्टर के केबिन में चले गए। डॉक्टर ने मां का जांच किया और फिर वापस दो दिनों के बाद डॉक्टर ने मिलने को कहा । हम दवाइयाँ लेकर घर वापस आ गए । वो युवती भी डाक्टर से दिखवा कर चली गई थी।
दो दिनों के बाद हम फिर अस्पताल मैं गए फिर वैसी ही भीड भार थी हम पास में खाली पड़ी कुर्सी पर बैठ गए तभी वहाँ वो औरत भी आकर बैठ गई । शायद डॉक्टर ने उसे भी बुलाया था। अब हमारी पहचान हो चूंकि भी इस लिए मैं उसे देख कर थोड़ा मुसकाई और पूछा आपका नाम क्या है?
वो भी हँसते बोली - सरोज! मैं पास ही में रहती हूँ । और आप कहाँ रहती है ?
मैने कहाँ - हम भी यही पास हीं में रहते हैं। पर आप इस अवस्था में अपने साथ किसी को क्यों नहीं लेकर आई? आपके पति या कोई भी नहीं आ सकते थे?
सरोज फिर से उदास होकर कहने लगी ,- दीदी मेरे पति मुझे तनिक भी नहीं मानते है न ही मेरी कोई चिंता है। वो अपनी भाभी की बात में रहते है और सास ससुर मुझे क्यो मानेंगे। जब पति ही अपना न हो तो कौन अपना सकता है। दो-दो लङ्की है इस लिए जीना पड़ता है अगर मैं मर जाऊँ लड़कियों को कौन देखेगा? वे तो यहीं चाहते हैं कि कब मैं मर जाऊं उसके बाद वे स्वतंत्र हो कर जो चाहे करें । माँ- बाप बचपन में ही स्वर्ग सिधार गए । इसलिए भाई-भाभी को भी डर लगता है कि कहीं मैं उनके पास जाकर उन पर बोझ न बन जाऊँ इसलिए वे पलट कर पुछ्ते भी नहीं कि मैं कैसी हूँ? मेरा न जाने भाग्य में क्या लिखा है भगवान ने ।जन्म से लेकर अब तक कांटा ही कांटा मिला। जब छ: महीने की थी को तो माँ स्वर्ग सिधार गईं। और अगले साल की ही पिता में दूसरी शादी कर ली। सौतेली माँ ने कभी दिल से मुझे अपनी बेटी जैसा प्यार नहीं दिया। और जब उनका अपना बेटा मेरे भाई का जन्म हो गया तब तो मैं और भी ज्यादा आँखों में चूभने लगी। किसी तरह पन्द्रर साल की कच्ची उम्र में एक शराबी के साथ मेरी शादी कर दी। तब से मैने कभी मायके के तरफ़ नहीं देखा । जो मेरी किस्मत में था उसे सर झुका कर स्वीकार कर लिया। शुरू के पहले साल तो पति ने भी बहुत प्यार किया लेकिन जब पहली लड़की का जन्म हुआ तो सास के ताने और उनके प्यार में भी कमी के साथ जीवन जीना सीख लिया।
दीदी! मैं ज्यादा पढ़ी-लिखी तो नहीं दूं कि उनका विरोध कर अपना स्वतंत्र जीवन जी सकूं। पर अब बहुत दुख होता है कि अगर माँ बाप का साथ होता तो मेरी जिन्दगी इतनी विवश नहीं होती।
मैं उसके दुःखों के समंदर में इतनी खो गई कि भूल ही गई कि बहुत समय बीत गया है । और हमारी बारी आ गई मैं मां को लेकर डॉ के कविन में चली गई। उसे आश्वासन देने के अतिरिक्त कुछ नहीं था मेरे पास । मैं सिर्फ इतना ही कह पाई कि, हिम्मत रखिए सब ठीक हो जाए अपना ध्यान रखना और अपनी बच्चियों का भी ।... क्रमशः
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