पीली धूप | Chapter 2
नीलिमा अपने छोटे से कमरे में दीवार से सटे चारपाई पर मुनिया को लेटा देती है ,और अपने मन को बांधते हुए अपने भींगे कपड़ों को बदलकर मुनिया के पास आकार लेट जाती है |बारिश की झम- झमाहट अब कम होने लगी थी ...| शायद इंद्र देवता भी उसके दुःख को समझ रहे थे |उसे अब सुबह होने का बेसब्री से इन्जार था | ताकि हरीश का पता लगा सके ....|
वीरगंज जैसे छोटे और पिछड़े गाँव से निकल कर शाहपुर के बस्ती में उसका छोटा सा आशियाना अपनी जीवन गति से चल रहा था | जहाँ नीलिमा अपने कुशल गृहस्ती को बड़े जतन से सजा सवांर रही थी |वो हिम्मती और होशिआर भी थी |अपने पति के छोटी सी किताबों की दुकान के आमदनी से संतोष और ख़ुशी से रह रही थी |और कुछ पैसे वीरगंज में रह रही हरीश की अम्मा को भी भेज देती | कुछ पल के लिए नीलिमा अपने जीवन के गुजरे पलों में खो गयी और शायद आँखे लग गयी |
सुबह की पहली किरण के साथ ही नीलिमा की आँखे खुल गयी थी या फ़िर रात भर सोयी ही नहीं थी ..|सावन की झमाझम बारिश के बाद ये सूरज की पहली धूप में पूरा घर और मुहल्ला जैसे पीली रौशनी से नहा रहा था और इस फैले प्रकाश में शायद हरीश कहीं दिख जाये यही आशा लेकर नीलिमा की आँखें चारों ओर खोजने लगी...,पर कहीं कोई नहीं दिखा | अब तो उसे स्टेशन जाकर दुकान में देखना था की कही हरीश दुकान में हीं तो नहीं ठहर गया |बीस बाईस- बरस की नीलिमा एक माँ भी थी सो मुनिया को वो नज़रअंदाज नहीं कर सकती थी |उसने मुनिया को दूध पिलाया और पड़ोस की मिश्रा जी की अम्मा के घर जाकर बोली - अम्मा ! मुनिया को यही आपके पास छोड़ देती तो अच्छा होता स्टेशन बहुत दूर है और रात के बारिश के बाद शायद कई पेड़ टूटकर गिरने से रास्ता भी बंद हो गया है |इसे वहाँ ले जाउंगी तो बीमार हो जाएगी |
अम्मा तुरंत बोली -अरे इसमें इतना काहे सोंच रही हो मुनिया हमार बिटिया ना है का ? जा ! तू जा क हरी का पता लगा व !....
आ मुनिया क़ चिंता मत कर !
कुछ खाए के लगे ले ल ...| और मंगल भी तोहरे साथ जाई तनिक रूक जा ,
न जाने किस विपत्ति मैं फंस गया होगा जो रात भर घर नाही आ सका!!
नीलिमा सकुचाते हुए ठहर गई और बोली - ठीक है अम्मा,... पर कुछ खाए के मन नाहीं करत है...|
बस हम अब जात हैं अम्मा मुनिया के थोडा ध्यान देम .!
कहकर मुनिया को अम्मा के पास छोड़ कर नीलिमा और मंगल स्टेशन की तरफ़ चल देते हैं।
नीलिमा के अन्दर अब सूरज की गर्माहट के साथ थोड़ी हिम्मत और शक्ति संगठित हो गयी थी |... स्टेशन जाने के लिए उसके पास इतने पैसे नहीं थे की कोई ऑटो कर सकती थी सो पैदल ही चलती जा रही थी पर मंगल ने कहा तनिक रूक जा बहुरिया कोनो ऑटो रिक्शा कर लेत हैं।
मंगल पैतालीस- पचास बरस का सरकारी नौकरी करने वाला एक नेकदिल और ईमानदार इंसान था। हरीश को पिछले दस सालों से जानता था उसे अपना छोटा भाई मानता था। हरीश भी मंगल भाई के हर दुःख दर्द में साथ रहा था। अभी पिछले हीं साल जब पूरी बस्ती में दंगा भड़क गया था तो उसने अपनी हिम्मत से अम्मा और मंगल भाई के परिवार को बचाया। बस्ती के पीछे शाहपुर के वासिंदो का एक टोला है जहां एक छोटी सी तालाब है। अक्सर उस तालाब में गाँव के लोग मछली पकड़ने आते हैं। मंगल का भाई बिराज भी उस तालाब में अपने कुछ दोस्तों के साथ मछली पकड़ने गया था। इसी में दोनों गुटों में कुछ मार -पीट होने लगी। और लड़ाई इतना भड़क गया कि गांव वाले मिलकर बस्ती को ही जलाने पहुंच गए खास कर मंगल का घर पहले निशाने पर था।लेकिन हरीश को इस बात की खबर पहले लग गई थी इसलिए पहले ही हिम्मत करके बस्ती वालों को साथ में लेकर पुलिस अधिकारी को खबर कर देता है और एक बड़ी दुर्घटना को होने से बचा लेता है । मंगल पूरे रास्ते सोच रहा था कि आखिर हरीश जैसा तेज और हिम्मती लड़का कहां फंसा रह गया।
तभी ऑटो रिक्शा चालक ने रेलवे स्टेशन पर पहुंच कर बोला- भईया स्टेशन आ गया!
हा हा! ठीक है!! रोक दो और मंगल पैसे देते हुए उतरने लगा।
मंगल और नीलिमा ऑटो से उतरकर सीधे दुकान की तरफ़ गली में बढ़ गए।
दुकान के आस पास कुछ बिखरा बिखरा सा दृश्य था।
नीलिमा का कलेजा सूख गया।अब तो उसे बहुत बड़े अनहोनी का डर लगने लगा, पर हिम्मत मजबूत किए आस पास के दुकानदारों से पूछताछ करने लगी।मंगल भी दुकान के टूटे हुए गेट देखकर समझ गया था कि कुछ तो गलत हुआ है। सो वह भी आस पास के लोगों से पूछने की कोशिश करने लगा।
रात के तूफान के बाद सुबह सुबह बहुत कम हीं दुकान खुले थे । वहीं पास में जगेसर के चाय की दुकान थी सो दोनों वहीं गए और पूछा- भाई! यहां हरीश के किताब की दुकान पर कल कुछ हुआ था क्या?
दरअसल हरीश कल से आज तक घर नहीं लौटा इसलिए हम परेशान हैं । अगर आपलोगों को कुछ मालूम है तो बता दीजिए आखिर यहाँ क्या हुआ था?और हरीश कहां है ?
जगेसर ने कहा - भईया! कल दोपहर को पास के जी.एस.कॉलेज के कुछ बच्चे यहां हंगामा कर रहे थे। हरीश भईया उनसे अपना बकाया मांग रहे थे तभी उन उदंड लड़कों ने अपने गांव के लड़को के साथ मिलकर मार पीट कर रहे थे फिर वे हरीश भाई को कहीं खींच कर ले गए। उसके बाद हमें नहीं मालूम क्या हुआ? कल बारिश इतनी तेज़ थी की आंधी के डर से ज्यादातर दुकानदार अपनी - अपनी दुकानें बंद करके चले गए।सो मैं भी चला गया। और मुझे हरीश के घर का भी पता नहीं मालूम था।अब आप आये हैं तो आप को बताए रहा हूं सच मानिए कल से मन मेरा भी बहुत बेचैन था।
तभी एक सज्जन जो चाय की दुकान पर चाय पीने आए थे ये सब सुनकर बोले- भईया!!..
इस परदेस में हम अपने गांव को छोड़ कर दूसरों की बस्ती में कब तक सुरक्षित रह पाएंगे। कहने को पूरा देश एक है पर हर जगह सौतेला व्यवहार होता है ।
ये सब सुनकर नीलिमा का पैर कांपने लगा।वो बड़ी मुश्किल से अपने आप को संभाल पाई और बोली - भईया लगता है अब हमें पुलिस चौकी जाकर रिपोर्ट कर देनी चाहिए। मंगल ने भी यहीं उचित समझा और दोनों पुलिस चौकी की तरफ़ चल दिए।
क्रमशः.....
डॉ. माधुरी


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