We, Our constitution And society



 हम, हमारी कानून व्यवस्था और समाज


स्वतंत्र भारत में निवास करता हुआ प्रत्येक नागरिक वर्तमान समय में न तो पूर्णतया सुरक्षित है न हीं लोकतंत्र के महत्त्व से फलीभूत हो पाया है । लोकतंत्र के निर्माण के पीछे एक मात्र मकसद था देश में शांति भाईचारा ,एकता और प्रेम के अतिरिक्त राज्यों के सीमाओं से परे , भाषाओँ और भिन्न धर्मो को मिलकर रहना ।परन्तु यथार्थ तो बिलकुल अलग ही है ।वर्तमान समय में एक तरफ़ जाति , भाषा ,और राज्यों के सीमाओ के नाम पर लड़ाई हो रही है । तो कहीं धर्म के नाम पर कत्लेआम हो रहे हैं ।हर शहर ,मुहल्ला ,गाँव ,और चौक -चौराहों पर सरेयाम लूटपाट ,क़त्ल ,अपहरण और बलात्कार जैसी घटनाये आये दिन होते रहते है । ऐसे में हम कहाँ तक सुरक्षित हैं और कैसे हम लोकतंत्र के कानून व्यवस्था पर विश्वास करें ?विश्व की सबसे विशाल लोकतंत्र में समाज के आम जनता जो कानून के सहारे जीवन जीने का प्रयास कर रहा है वह ही इस भ्रष्ट और आतंकित माहौल में असुरक्षित महसूस करने लगा है । संविधान की व्यवस्था में कहाँ चूक बाकि रह गयी जो हमें हमारी कानून व्यवस्था पर से विश्वास हटने लगा ।क्योंकि दिन हो या रात ,स्त्री हो या पुरुष किसी के साथ कभी भी कोई मर्माहत घटना हो सकती है कभी कभी तो कानून का रखवाला हीं अपराध को बढ़ा कर हमसे हमारी स्वतंत्रता छीन लेता है।


     समाज में फ़ैल रहे इस आतंकित माहौल का जिम्मेवार कौन है ? क्यों अपराध का आकार दिन व दिन बढ़ता हीं जा रहा है ? क्यों अपराधी घटना का अंजाम देकर निशंक भाव से सरेयाम घूम रहे होते हैं ? क्यों कानून और प्रशासन उनको पकड़ कर सख्त सजा नहीं देती ?अपराधी हमारे बीच निर्भय होकर अपने अगली घटना को आकार देने से जरा भी नहीं डरते ?आखिर हमारी कानून व्यवस्था इतनी लाचार और विवश है |कहीं न्याय व्यवस्था का अत्यधिक लचीलापन होना हीं अपराधियों के मनोबल को बढ़ने का कारण तो नहीं है ।या फ़िर ईमानदारी से कानून व्यवस्था का उचित प्रयोग कने में प्रशासन कमजोर है ।प्रशासन की इस असमर्थता का कारण कहीं न कहीं प्रशासन के क्षेत्र में राजनैतिक हस्तक्षेप भी है ।जिसके कारण सत्ताधारी नेता अपराधियों को पोषण देकर हमारी कानून व्यवस्था को और भी कमजोर और पंगु बना रही है।


 और अपना हित साध कर खुश है ।  ऐसे में क्या ये उचित नहीं की शासक के बढ़ते प्राधिकार को नियंत्रित किया जाय ताकि हमारा कानून सत्ता के अधीन न होकर स्वतंत्र निर्णय लेने में सक्षम हो सके ।  जब हमारी कानून व्यवस्था सत्ता के बंधनों से मुक्त हो जाएगी तो जातिगत भेदभाव और आर्थिक असमानता की दूरियों को मिटाकर प्रशासन अपराधियों के प्रति सशक्त कदम उठा पाने में राजनैतिक दबावों से भी मुक्त हो जाएगी ।जिससे जनसाधारण को उन पर पुन: विश्वास स्थापित हो पायेगा ।


                           इसके अतिरिक्त समाज में अपराध का एक और मूल कारण है हमारी सामाजिक मनोदशा जो अपराध को फलने फूलने में काफ़ी हद तक मदद करती है । समाज में बढ़ रहे आर्थिक असमानता के कारण एक दुसरे के प्रति ईर्ष्या ,द्वेष और लालच के साथ साथ बेईमानी भी बढ़ रहा है । दूसरी ओर गरीबी,बेरोजगारी और महंगाई भी दिन ब दिन बढ़ हीं रहे हैं और इसे में व्यक्ति सिर्फ़ अपने आप तक सिमित  सोच रखते हुए स्वार्थ पूर्ति में जूता हुआ है दूसरों के हानि से कोई मतलब नहीं है ।भरे समाज में किसी के साथ अगर कोई अन्याय या बेइज्जती होती भी है तो कोई भी इसके विरुद्ध आवाज उठाने वाला नहीं है ।सरेआम हत्या बलात्कार होने पर भी लोग मूकदर्शक बन कर रह जाते हैं ।क्या ये सामाजिक मनोदशा अपराध को बढ़ने का जिम्मेवार नहीं है ?उन अपराधियों के निर्भीकता को बढ़ने में हमारा समाज साथ नहीं दे रहा है । इसपर चिंतन करना आवशयक है ।इस समाज की मनोदशा कब बदलेगी जब भ्रष्टाचार की सागर में दुनिया का अस्तित्व मिट जायेगा तब । क्यों हम भूल जाते है की अपराधियों को सही समय पर दंड नहीं मिलेगा तो ये रक्तबीज बनकर हमें और हमारी संस्कृति को धूमिल कर धीरे धीरे नष्ट कर देंगे ।


  समाज में निरंतर बढ़ रहे अपराधिक मामलो पर नियंत्रण करने की पहल कहीं न कहीं से तो शुरू करनी ही होगी । नहीं तो हम स्वतंत्र होकर भी गुलामी की जिंदगी गुजरने के लिए विवश हो जायेंगे । जिसमे हर व्यक्ति कहीं न कहीं डरे ,सहमे ,आतंकित और असुरक्षित माहौल में जीने के लिए बाध्य होता जा रहा है । इसलिए हमें देश को आतंक मुक्त और न्याय संगत राष्ट्र के रूप में पुन:स्थापित करने होगा । यह तभी संभव है जब जन - जन के मन में वो विश्वास जागृत किया जाए कि किसी भी रूप में न्याय उनके पक्ष में  ही होगा तब ही समाज का हर वर्ग अपने विरूद्ध हो रहे अत्याचार पर प्रतिक्रिया व्यक्त करने में संकोच नहीं करेंगे । न्याय प्रक्रिया में अगति इतनी हो कि कोई भी अपराधी लम्बे समय तक अपने अपराध की सजा पाने में स्वतंत्र घूम न सके ।  न्यायिक गतिशीलता से समाजिक जागरूकता और विश्वास से हर अपराधी अपने दण्ड के भय से अपराध करने के पहले कुछ जरूर शंकित होगा और पय भ्रमित होने से रूक पायेगा ।


         वर्तमान समय में जरूरत है ईमानदारी और दृढ शक्ति की एक चिनगारी की जो कमजोर सामाजिक मानसिकता को दृढ़ता प्रदान कर सके । साथ ही कर्त्तव्य याद दिला सके । एक शिष्ट और सभ्य समाज की ज्वाला में भ्रष्ट और अपराधी को जलाकर भस्म करने की ताजी चारों ओर भाईचारे और अपमान के साथ खुशहाल और आतंकमुक्त जीवनशौली का बीजारोपन हो सके । जरूरत है कानून को हमारी और हमें कानून की आपसी सामंजस्य के द्वारा ही इस अपराध का अन्त निश्चित किया जा सकता है ।


Dr.Madhuri

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