पीली धूप ( Novel) chapter 1


नीलिमा का संघर्ष


कल से हो रही मुसलाधार बारिश में पूरा घर गली मुहल्ला सब इस कदर डूब गया था की एक इंच भी चलने के लिए जगह नहीं बची थी..... | 


एक तो संकड़ी गली और उसपर गली के मुहाने पर कूड़े के लगे अंबार से नालियाँ भी अपना रास्ता भूल चुकी थी और गली में फ़ैल कर घरों की तरफ़ अपना पैर पसारने लगी थी... |


रात होने वाली थी और बारिश छुटने का नामो निशान भी नहीं था |


दो साल की मुनिया अपने पापा के आने के इंतजार में दरवाज़े पर टकटकी लगाये बैठी बैठी सोने लगी |


तेज बारिश से उसका घर पूरी तरह भीग गया था |छत के टीने से टपकते बारिश के पानी से मिट्टी का चूल्हा पूरी तरह भीग गया था |


नीलिमा (उसकी माँ) ने  पूरी कोशिश की ताकि  घर के कोने कोने को भीगने से बचा ले  लेकिन  तंगी और गरीबी का मजाक उड़ाते ये गरजते बादल और बिजली की चमचमाती रौशनी उसे चुभ रही थी ......|


हरीश(मुनिया के पापा ) अभी तक नहीं लौटा था हर दिन तो शाम के पांच - छः बजते बजते आ जाता था क्योंकि वो रेलवे स्टेशन पर अपनी एक छोटी सी दुकान चलाता था और उस स्टेशन  पर शाम पांच बजे के बाद कोई गाड़ी नहीं आती थी उसके बस्ती  से स्टेशन बहुत दूर होने के कारण उसे अपने साइकिल  से ही आना- जाना पड़ता  था...... |


लेकिन आज बारिश के तेज आँधी  में न जाने अब तक कहाँ होगा?


नीलिमा की चिंता बढती जा रही थी |


सोंचा जरा चौराहे के मुनीम जी से पूछ आऊँ , वो तो हर दिन उसी स्टेशन से शाम पांच बजे अपने दफ्तर से आते हैं | जाकर पता लगाऊँ की क्या बात है ?


कोई अनहोनी की आशंका से उसका मन बैठा जा रहा था......  |


पर अकेली मुनिया को कहाँ और किसको सौंप कर जाए | उसे बस्ती में आये अभी कुछ ही महीने हुए थे ज्यादा जान पहचान भी नहीं बन पायी  थी | तभी घंटे की आवाज़ से पता चला की ग्यारह बज गए  हैं....  | अभी तक हरीश नहीं आया था और बारिश की रफ़्तार और तेज़ हो गयी थी इस  तुफानी रात में नीलिमा का  दिल घबराहट से जोर जोर से धड़कने  लगा अब और वो इंतजार नहीं कर सकती थी... |


सो मुनिया को गोद में लेकर तेज कदमो से चौराहे की तरफ़ बढ़ने लगी.... |तेज़ बारिश के थपेड़ों से जूझती मुनिया को गोद में छुपाये आँधी की गति से कुछ ही पलों में वो चौराहे के पास वाली गली जहाँ मुनीम गंगाराम का आलिशान घर था पहुँच गयी.. |


आज तक उसने मुनीम जी से कभी बात नहीं की थी ......


वो तो जब पहली बार अपने गाँव से आ रही थी तो हरीश ने ही स्टेशन पर उनसे मिलवाया था और उनके बारे में बताया था की वे भी उन्ही के  गाँव से आते है  सो इस परदेश में हमसाथी हैं | नीलिमा ने बड़ी हिम्मत जुटाकर मुनीम जी के दरवाजे से आवाज़ लगाई |


मुनीम चाचा ,मुनीम चाचा  !और दरवाजे पर लगी कॉल बेल बजाई | मुनीम जी हरबरा कर दरवाजे पर आये  और पूछा क्या बात है इतनी रात को नीलू तुम यहाँ!..... सब ठीक है ना.... !


नीलिमा की आँखे भर आई और सब्र का बांध टूटने लगा ,लेकिन अपने आप को सँभालते हुए कांपते हुए  स्वर में पूछा - चाचा !,  स्टेशन से अभी तक इनका कोई पता नहीं है ...अभी तक घर नहीं लौटे हैं पता नहीं क्या हुआ ?.....


मुनीम जी भी घबरा गए और अचंभित होकर कहा -क्या अभी तक नहीं लौटा है हरीश ?


पर मै जब स्टेशन से आ रहा था तो सारी दुकाने बंद थी और हरीश की दुकान भी बंद थी ....!  फ़िर कहाँ रह गया होगा ?... इस तुफानी रात में !.. माहौल भी ख़राब चल रहा है | पर तुम ज्यादा चिंता मत करो,  शायद तूफ़ान और बारिश की वजह से रास्ते में कही रुक गया होगा...! क्यूंकि सड़क पर पानी बहुत भर गया था और आने जाने का रास्ता भी  ठीक से नहीं दिख रहा था| तुम घर जाओ शायद आ गया हो ...,अगर सुबह तक नहीं आता तो पुलिस  को इन्फॉर्म करना पड़ेगा |तुम चिंता मत करो बच्ची का ख्याल रखो रात भी बहुत हो गयी है घर जाकर आराम करो |


नीलिमा अब और भी ज्यादा परेशान हो गयी ...मुनीम जी की बातों में संशय  और हिम्मत दोनों थे..... लेकिन अकेली नीलिमा के लिए यह दुखों के पहाड़ की आशंका लग रही थी ..! 


वो चुपचाप मुनिया को गोद में छूपाए आंसूओ और आशंकाओं के भंवर में डूबती चली जा रही थी इस सैलाब में वो निस्सहाय  अपने घर की तरफ़ बढती जा रही थी  ....| जितने करीब उसका घर आता जाता उसके मन की बेचैनी बढ़ती जाती, 


एक मन कहता शायद हरीश घर आ गया हो !  दुसरा उसके ना आने के अन्देशे से विचलित हो रहा था ...|


तेजी से कदम बढ़ाते हुए घर के गली के नजदीक पहुँच गयी ...|अँधेरी रात के सन्नाटे में बिजली का कड़कना कभी- कभी थोड़ी रौशनी दिखा जाता जिसमे संकड़ी गली और भी डरावनी लग रही थी दूर दूर तक कोई नहीं था ...गली के कुत्ते भी बारिश के कारण किसी ओट में छुप कर बैठे थे ..|


आज उसका छोटा सा घर बहुत सुनसान और उदास लग रहा था ...अपने मन को सँभालते हुए तेजी से घर की तरफ बढ़ने लगी तभी पास के मिश्रा  जी की अम्मा ने उसे देखा और टोका-  क्या हुआ मुनिया की माँ इतनी रात को कहाँ से  इतनी तेजी से भीगते हुए आ रही हो ? सब ठीक है?  ना बारिश भी मुआ जान लेके ही रुकेगा ..वो तो मेरे  दवा खाने का समय था तो पानी लेने उठी थी , तुम्हारी आहट सुनकर इधर आ गयी क्या हुआ/मुनिया की तबियत तो ठीक है ना ?


नीलिमा ने घबराते हुए कहा- पता नहीं अम्मा अभी तक मुनिया के पापा घर नहीं लौटे है ? 


मुनीम जी से पूछा तो उन्होंने कहा की स्टेशन पर तो सारी दुकाने बंद थी फ़िर न जाने कहाँ रह गए ? मन बैठा जा रहा है इधर आते देखा है क्या अम्म्मा ?..


अम्मा भी परेशान होते हुए कहा -क्या ? अभी तक हरी नहीं आया है ???!और अपने बड़े  बेटे को जगाया- अरे ओ मंगल ...! देख तो हरीश अभी तक दुकान से नै लौटा है..पता नहीं कहाँ फंस गया इस तुफानी रात  में...  |क्या हुआ अम्मा!... मंगल घबराते हुए जगता है....अम्मा रात  बहुत हो चुकी है .और बारिश भी तेज है ... हारीश कही रास्ते में फंस गया होगा सुबह होने दो तो जा कर देखते हैं |  नीलिमा घर जाओ अभी चिंता मत करो आ जायेगा | 


नीलिमा को सभी हिम्मत बंधा रहे थे |पर उसकी अन्तर्दशा अभी शायद ही कोई समझ पाता  | नीलिमा अपनी घर में   निराशा और हताशा भरी  कदमो से अन्दर जाती है जहाँ  हरीश को ना पाकर फुट फुट कर रोने लगाती है |इस बेगाने शहर में एक नन्ही  सी बच्ची  के साथ हरीश के अलावा  और कोई उम्मीद नहीं था उसके लिए ...! 


आखिर हरीश कहाँ रह गया ?...


क्यों नहीं लौटा घर ?...


कहीं कुछ अनहोनी तो नहीं हो गयी उसके साथ ?...


नीलिमा कैसे ढूंढेगी  हरीश को ?...


कैसे इस शहर में अकेले बच्ची की जिम्मेदारी उठाएगी ?...और भी बहुत कुछ जानने के लिए अगले अंक की प्रतिक्षा कीजिये ...


आपको ये अंश कैसा लगा ज़रूर बताइये .....

Dr. Madhuri...






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